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सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

रोशनी हैं बेटियां


इस  रचना  को इस की उपयोगिता समझते हुए साभार "रविवार.com" से लिया गया है व् सशब्द मूल रूप में ही प्रकाशित किया जा रहा है आदरणीय कुमुद सिंहजी से  संपर्क हेतु  कोई इ मेल अथवा फोन नं न  होने के कारण पूर्व अनुमति नहीं ली जासकी जिसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं

                              "एक प्रयास "बेटियां बचाने का 

रोशनी हैं बेटियां

कुमुद सिंह


किस्सा पिछली दीपावली का है. घाघरा-चोली पहने इठला कर चलती नन्हीं बिटिया ने जब अपनी तोतली जबान से पूछा-“मां मैं भी कललूं लोशनी(रोशनी)”, कानों में मानो मिश्री-सी घुल गई. बिटिया का मुख चूमते हुए उसे अपनी गोद में बिठाकर हम दीपक में रोशनी करने लगे.
बेटियों से भेदभाव

बात सामान्य तरीके से वैसे ही कही गई थी, जैसे इस उम्र के बच्चे करते हैं, लेकिन न जाने क्यों लगा, जैसे आज पूजा से पहले ही लक्ष्मी, सरस्वती,दुर्गा के साक्षात् उपस्थित होकर कुछ संदेश दिया है. क्या है वह अनकहा?

मन बार-बार उस सवाल को सुलझाने का प्रयास करने लगा. दीपावली सभी घरवालों और पास-पड़ोस के लोगों के साथ मनाई, मिठाई का आदान-प्रदान, फुलझड़ी-अनार का मजा सब चलता रहा, लेकिन मन निरंतर उसी ‘अनकही’ पर अटक गया. लोगों से मिलना-मिलाना भी चलता रहा.

तभी कालोनी में थोड़े दिन पहले ही रहने आए सोलंकी परिवार से परिचय हुआ. फिर हमेशा की तरह महिलाओं के सवाल शुरू हो गए-पति क्या करते हैं. घर में कौन-कौन है. कितने बच्चे हैं. श्रीमती सोलंकी (क्योंकि अभी तक उनका नाम नहीं पूछा गया था) ने बहुत दबी जवान से जवाब दिया-दो बेटियां ही हैं जी. अचानक श्रीमती गुप्ता का स्वर सहानुभूतिपूर्व हो गया-“अरे-रे... बेटा नहीं है,.. बेचारी. एक हमारे यहां देखो. मेरे तीन बेटे, दो बेटों के यहां दो-दो बेटे, तीसरे के अभी एक बेटा है, सोचते हैं एक बेटी हो जाए तो कन्यादान का पुण्य भी कमा लेंगे. अरे भई तुम तो एक बेटे के लिए जरूर सोचो. अरे जांच करा लेना, बेटा तो होना ही चाहिए. कुलदीपक के बिना कुल कैसे चलेगा?”

वे लगातार बोले जा रही थीं और श्रीमती सोलंकी सिर नीचा किए ऐसे खड़ी थीं जैसे अक्षम्य अपराध किया हो. मेरा मन आक्रोशित हो उठा. उन्हें कुछ कहूं, उससे पहले बिटिया पर निगाह चली गई. देखा हवा के झोंके से एक दीपक को वो लड़खड़ा रही थी, बिटिया उसे दोनों हाथों से बचाने की कोशिश कर रही थी और सफल होने पर कोई गर्व किए बिना चुपचाप उठ कर इधर-उधर घूमने लगी. न जाने क्यों आज बार-बार उसके मासूम चेहरे में लक्ष्मी-दुर्गा-सरस्वती कुछ कहती नजर आ रही थीं.

फिर श्रीमती गुप्ता की बात याद आ गई कि- बेटी पूरे खानदान में एक हैं तो भी बहुत है, क्योंकि कन्यादान का पुण्य कमाने को एक ही बहुत है. कब पहचानेंगी ये महिलाएं अपनी शक्ति को, कब तक ये खुद के बेटी होने पर और बेटी को जन्म देने पर स्वयं को अपराधी समझती रहेंगी? कब तक बेटी को दान की वस्तु बना कर रखेंगी? कब तक बेटों की मां गर्वीलें स्वर में और बेटियों की मां दबी जबान में बोला करेंगी? समय बदल रहा है. देश-दुनियां में काफी विकास हो रहा है. मानव चांद पर बस्ती बसाने जा रहा है, लेकिन नहीं बदली तो बेटियों के प्रति हमारी सोच और स्वयं स्त्री का खुद को कमतर समझना.

मन उड़ने लगता है, जब सुनीता विलियम अंतरिक्ष में उड़ती है या फिर कोई गंगा गांव की सरपंच बन सुशासन की राह पर चल पड़ी है, लेकिन उतनी ही ऊंचाई से नीचे धड़ाम से गिरता है, जब एक भारत की सशक्त बेटी सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर कहती हैं कि अगले जन्म में बेटी होना नहीं चाहती. उनके एक ही वाक्य से हट गया उस विकास के दावे से पर्दा, जिसका हम ढिंढोरा पीटकर खुश होते हैं.

मन चीखने को करता है, जब बेटियों का कत्ल करने के बाद हरियाणा में लोग वोट के बदले बहू मांग रहे हैं, जब खबर आती है कि बुंदेलखण्ड में लोग अपनी धर्मपत्नी को बेच रहे हैं, जब देश के कई हिस्सों में लोग बेटियों की खरीद-फरोख्त कर अपने बेटों के लिए बीवियों का इंतजाम कर रहे हैं. इतने पर भी चेत नहीं रहे हैं लोग. बेटियों की लगातार घटती संख्या हमारे समाज पर लगे दाग को गहरा और गहरा कर रही है और समाज चुप है. सबसे ज्यादा चिंतनीय है, मां का चुप रहना. कवि दुष्यंत के शब्दों में- हो गयी है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए.

मैंने महिलाओं के बीच होने वाली बातचीत को थोड़ा बदलने की दृष्टि से श्रीमती शर्मा से पूछा – “आपकी बिटिया कैसी है? उसने इस बार पीएमटी की परीक्षा दी थी, क्या रहा रिजल्ट?” श्रीमती शर्मा बिना किसी अफसोस के बोली-“ हां, परीक्षा में बहुत अच्छे नम्बर आए थे लेकिन उसके पापा ने कहा खर्चा बहुत आएगा, अभी उसकी शादी में भी देना पड़ेगा, फिर बेटा भी अगली बार पीईटी की परीक्षा देगा, उसको बहुत आगे तक पढ़ाना है, उसके लिए भी पैसा बचाना है.”

मैने आश्चर्य से पूछा –“बिटिया ने कुछ कहा नहीं.”

वो बोलीं- “क्या कहेगी. दो-चार दिन रोती रही फिर समझ गई. सीता जैसी है जी मेरी बेटी-सीधी सादी. जैसा उसके पापा और भाई कहते हैं, वैसा ही करती है.”

उनकी बातों से मुझे झुंझलाहट हुई. मैने कहा- “आप सीता के विषय में क्या जानते हैं कि सीता बेचारी बहुत सीधी थी, जैसा भी रहना पड़ा रहीं. गलत जानकारी है आपको. सीता बेचारी नहीं थीं.”

सभी महिलाएं एकदम सकपका कर मेरी ओर देखने लगीं और दूर खड़े पुरुष भी नजदीक आ गए और मुझे आश्चर्य से देखने लगे.

असल में बहुत कम लोग इस बात को जानना चाहते हैं कि सीता बेचारी नहीं सुशिक्षित, संस्कारी बेटी हैं. वो शक्ति का स्वरूप हैं. जिस धनुष को श्रीराम ने जवानी में तोड़ा, उसे सीता ने उस वक्त तोड़ दिया था, जब उनकी उम्र गुड़ियों से खेलने की थी. सीता कमजोर नहीं, श्रीराम से ज्यादा शक्तिशाली थीं. भगवान राम ने तो स्वयं स्वीकार किया है कि सीता ही उनकी शक्ति है. और सीता बेचारगी के कारण नहीं चली थीं राम के संग हर परिस्थिति में. वो सीता को मातृपक्ष से मिले संस्कार थे, जिसने उन्हें जीवनसाथी का सही अर्थ समझाया था. जिसने उन्हें इरादों से इतना मजबूत बनाया था कि राम का जीवन भर साथ निभाने के उनके निर्णय को जंगल के कंटीले रास्ते भी नहीं डिगा पाये, और सबसे बड़ी बात सीता तन-मन के साथ मस्तिष्क से भी बहुत मजबूत थीं तभी अपने स्वाभिमान के चोटिल होने पर श्रीराम से अथाह प्रेम होने के बावजूद उन्होंने राम के पास लौटने के बजाय धरती में समाने का रास्ता चुना.

धरती में समाने का अर्थ खत्म होना नहीं था बल्कि व्यापक होना था ताकि इस धरती पर जन्मने वाली हर बेटी स्वाभिमानी,शक्तिशाली, संस्कारी हो. ऐसे में हमें समझने की जरुरत है और बेटी की शक्ति को पहचानने की भी. अगर अब भी हम नहीं जागे तो हमारी बेटियां यूं ही कोख में और संसार में मारी जाती रहेंगी और हम बेटियों की चीख को दीवाली के पटाखों के शोर में अनसुना करते रहेंगे.

बातचीत का सिलसिला लंबा चला और आखिर में लगा कि मेरे आसपास खड़ी महिलायें शायद पहली बार बेटी होने के महत्व को जान रही थीं. पास ही में मेरी बिटिया इन सब बातों से अनजान अपने रोशन किए हुए दीपों को निहारते-निहारते सो गई थी, उसके चेहरे पर सीता-सा तेज नजर आ रहा था. उधर उसके रोशन किए दीपक अमावस की स्याह रात को भरपूर चुनौती देते लग रहे थे. मुझे ठीक-ठीक याद है, पूरे साल भर हमारी कॉलोनी में बेटियों के महत्व पर गाहे-बगाहे चर्चा होती रही और बेटियों के हर कदम पर घर वाले उनके हौसले को सलाम करते रहे.

इस बार दीपावली में आप भी अपनी बिटिया के बारे में गंभीरता से सोचिएगा, बेटे अगर घर का दीप हैं तो रोशनी है बेटियां. 
लेखिका कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जनजागृति के लिए प्रतिबद्ध संस्था सरोकार की सचिव हैं

16.10.2009, 00.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

3 टिप्‍पणियां:

  1. दीपावली केशुभअवसर पर मेरी ओर से भी , कृपया , शुभकामनायें स्वीकार करें

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  2. बहुत ही नेक और सराहनीय कार्य कर रहे हैं मलकीत जी ...
    बहुत अच्छा लगा आपका ब्लॉग देख कर ....
    जारी रखें ....
    शुभकामनाएं .....!!

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  3. हरकीरत ' हीर' जी ब्लॉग पर आकर हौसला बढ़ाने का बहुत बहुत धन्यवाद

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